Monday, July 25, 2011

yaar

तेज धुप और वोह चमकता सूरज
मई की गर्मी और फर्शी की तपश
स्कूल की छुट्टी और आँगन का खेल
उस कल की याद और यादों का मेल

बहुत सोचा पर याद न आया उसका नाम
वोह मेरा साथी और मेरा यार, आज हो गया बेनाम

छुपम छुपाई हो या हो लगोरी
क्रिकेट की वोह टीम या हो भागमभाग
दाम देने के हो बारी
को कर लेते हम वोह बाँट

बहुत की हमने कैरी की चोरी
पडोसी हो या आंटी, कभी होते हम न सॉरी
पत्थर, डंडा और पेड़ पर चढाई
उस कैरी की लिए हमने की बड़ी लड़ाई

आज सिर्फ वोह यादें ही बाकी हैं
उस यार का नाम तो नहीं
पर शायद यारी बाकी हैं

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